Thikana Rajputana

राजपूताना का इतिहास, गीत और गौरव

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History Of Rajput

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राजपूतो मे सिंह शब्ध का प्रचालान!

जो महान देशभक्तों की श्रेणी में अग्रणी रहे हैं, जिन्होंने क्षत्रिय समाज को अपने जीवनकाल में अनेक उपलब्धियां प्रदान की हैं, उनमें से एक प्राप्ति ‘सिंह’ शब्द की है। क्षत्रिय समाज में अपने पुत्रों का कुंभा, जोधा, धंग, धारा, खेता, सांगा आदि नामकरण किया जाता था।
जननी जन्म भूमि के लिये जो नि:स्वार्थ भाव से समर्पित होते रहे हैं। वास्तव में वे ही महापुरुष कहलाते हैं और इतिहास ऐसे वीर पुरुषों की विरदि बरवान करते-करते नहीं अघाते हैं। वह समाज में अपने पीछे एक छाप छोड़ जाते हैं। जो अनुकरणीय होती है। आदर्श कहलाती है। भारत में सौराष्ट्र प्रान्त के एक ऐसे ही राजपुरुष की कहानी है। जिसके पौरस की गाथाएं कभी इस देश की धरती पर गूंजती रहती थीं। जो महान देशभक्तों की श्रेणी में अग्रणी रहे हैं। जिन्होंने क्षत्रिय समाज को अपने जीवनकाल में अनेक उपलब्धियां प्रदान की हैं। उनमें से एक प्राप्ति ‘सिंह’ शब्द की है। क्षत्रिय समाज में अपने पुत्रों का कुंभा, जोधा, धंग, धारा, खेता, सांगा आदि नामकरण किया जाता था। नाम के साथ शब्द लिखने का प्रचलन नहीं था। जो महाराजा खेतसिंह खंगार की ही देन है।
दिल्लीश्वर महाराजा पृथ्वीराज चौहान अपनी युवा अवस्था में गिरनार के वनों में शिकार खेलने जाया करते थे। एक बार उन्होंने जंगल में देखा। एक नौजवान राजकुमार वनराज को ललकारकर कुश्ती लड़ रहा है। कभी वनराज ऊपर होता था तो कभी नरराज। चौहान वह दृश्य देख आनंद विभोर होकर अवसन्त खड़े रह गये। उनके देखते ही देखते, राजकुमार ने बलशाली वनराज को पछाड़ लगा दी और लात घूसों से उसको मार डाला। जब नरराज और वनराज का युध्द समाप्त हो गया तब चौहान उस वीर पुरुष के पास पहुंचे। बोले-बड़े बहादुर हो। क्या मैं आपका परिचय जान सकता हूं। वह युवक प्रतिउत्तर में बोला-पहले आप अपना परिचय दें। मैं शाकम्भरी चौहान, महाराज सोमेश्वर का पुत्र हूं, पृथ्वीराज चौहान। दिल्ली का प्रशासक हूं। युवक इतने जवाब से ही नतमस्तक हो गया। बोला-महाराज क्षमा करें। अज्ञानतावश मैंने मूढ़ता की है। मेरा परिचय लेकर महाराज क्या करेंगे, हम तो अब वनवासी जन हैं।
नहीं, नहीं आप अपना पूरा परिचय दीजिये। तुम्हारे लक्षण, राज परिवारों जैसे दिखते हैं। मुंह पर कहना अच्छा नहीं लगता है। आप एक असाधारण पुरुष हैं। मुझे सही परिचय देने में संकोच न करें। कहिये भद्र आप कौन हैं।
महाराज मेरे पितामह राजा ऊदलजी खंगार जूनागढ़ाधीश्वर थे, उन्हें यादव वंशी राजाओं ने धोखे से मार डाला और सत्ता छीन ली है। हमारा परिवार छिन्न- भिन्न हो गया। अधिकांश लोग, जेजाहूति प्रदेश चले गये हैं। मेरे पिताश्री रूढ़देव खंगार परिवार सहित पास में ही निवास करते हैं। मेरा नाम खेता खंगार है। यहां आखेट में आया था। वनराज से भेंट हो गई। परिणाम महाराज के सामने है। राजकुमार हम महाराज रूढ़देव के दर्शन करने की इच्छा रखते हैं। क्या हमें उनके दर्शन लाभ मिल सकेंगे।

हां महाराज जरूर चलिये, अब तो हम साधारण आदमी रह गये हैं। हमसे आपकी जो टूटी-फूटी सेवा हो सकेगी सेवार्पित करेंगे। दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान, पडिहार नरेश रूढ़देव खंगार से बड़ी आत्मीयता से मिलकर, बहुत प्रसन्न हो गये थे। बातचीत के क्रम में चौहान बोले-महाराज खेता राजकुमार बड़े अजेय योध्दा हैं। मैंने उनकी शूरवीरता देखी है। बड़ा प्रभावित हूं। महाराज आजकल देश की दशा ठीक नहीं है।
क्षत्रिय वंश आपस में ही लड़कर घात कर रहे हैं। जिससे देश की शक्ति का ह्रास हो रहा है। आये दिन यवन आक्रमणकारियों के हमले देश पर हो रहे हैं। रक्षा का चौकस प्रबंध केंद्र में नहीं है। जो बहुत जरूरी है। भारतभूमि की रक्षा के लिये आपसे जेष्ठ पुत्र खेता राजकुमार को मांगता हूं। उन्हें दिल्ली जाने की आज्ञा दे दें। देश की रक्षा, देशभक्त नौजवानों से ही संभव है। आशा है राजन मुझे निराश न करेंगे।
वनवासी रूढ़देव खंगार अवाक रह गये, कुछ देर बाद बोले-भारतभूमि के गौरव, महाराज पृथ्वीराज चौहान खेता राजकुमार के बल पर ही हम इस बियाबान जंगल में रहते हैं। खीचीकुमार अभी नादान है। महाराज की आज्ञा है जिसमें देशहित की बात कही गई है। टालने की हिम्मत नहीं हो रही है। क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
पृथ्वीराज चौहान कहने लगे-राजन, रघुवंश भूषण महाराज दशरथ ने मुनि विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा के लिए अपने दोनों राजकुमार राम-लक्ष्मण को भेजकर उनकी मदद की थी। यह तो जननी जन्मभूमि की रक्षा का सवाल है। आप देशरक्षा में भागीदारी कर सुयश प्राप्त करें।

रूढ़देव कहने लगे-महाराज की आज्ञा शिरोधार्य है। जननी जन्मभूमि के लिये तो मेरा रोम-रोम अर्पित है।
पृथ्वीराज चौहान राजकुमार खेता खंगार को उनके दल-बल सहित दिल्ली ले आए, बड़े हर्षित थे। चौहान कहने लगे मैं वनराज की खोज में निकला और पा गया नरराज को।
उस समय अजमेर में उपद्रव हो गया था। राजस्व वसूली बंद पड़ी थी। अशांति का वातावरण बन गया था। आते ही समय महाराज ने राजकुमार को बंदोबस्त के लिये अजमेर भेज दिया। उन्होंने अपने बुध्दि कौशल से पूर्ण शांति व्यवस्था की और राजस्व वसूली का सिलसिला जमाया।
पृथ्वीराज चौहान ने अपनी सैन्य व्यवस्था में सोलह सामन्तों की रचना की, उसमें राजकुमार खेता खंगार को प्रधान सामन्त नियुक्त किया गया। संयोगिता हरण में राजकुमार का भरपूर सहयोग लिया गया। चन्द कवि ने अपने पृथ्वीराज रासौ नामक ग्रन्थ में इसका वर्णन किया है। वे कहते हैं :-

खण्ड खण्ड निर्वाण सामन्त सार।
खैंची सुगोंड खेता खंगार॥
खित्त रन जीतियो।
पृथ्वीराज चौहान ने सत्रह बार मुहम्मद गौरी को इसी सामन्त के प्रबल पराक्रम से खदेड़ कर भगाया था। सन् 1182 ई. में उरई के मैदान में आला-ऊदल जैसे जगत प्रसिध्द बनाफर वीरों का मान मर्दन कर, परमार चंदेल पर विजयश्री प्राप्त की, जिसमें ऊदल मारा गया था और आल्हा भाग गया था।
पृथ्वीराज चौहान ने विजित प्रदेश का प्रबंध सामन्त खेता खंगार और पंजुनराय कछवाहा को सौंपकर सूबेदारी नियुक्त की। चौहान, चंदेल की लड़ाई की उथल-पुथल में, गौड़ों ने कुंडार कर कब्जा कर लिया। जो विजित क्षेत्र का अंग था। राजकुमार खेता खंगार ने, गौड़ों को कुंडार से खदेड़ भगाया और अपना झण्डा गाड़ दिया। पृथ्वीराज चौहान ने कुंडार को खेता खंगार सामन्त की निजी उपलब्धि मानकर उन्हें कुंडार का अधिपति घोषित कर दिया।
पडिहार राजकुमार खेता खंगार ने कुंडार को अपना मुख्यालय बनाया। वे महोबा छोड़कर कुंडार में आ गये। यहां आकर उन्होंने प्राचीन पध्दति से सर्वप्रथम परकोटे का निर्माण कराया। परकोटे का मुख्य द्वार वंदनवारनुमा बनाया गया। मुस्लिम कला देश में जोरों पर उभरकर आ रही थी बारहवीं शताब्दी में अंदर का निर्माण किया गया। जिसमें मौमिन कला की झलक दिखती है। उन्होंने एक आकर्षित सुदृढ़ और अति दुर्गम दुर्ग का निर्माण कराया। कुंडार अब गढ़कुंडार के नाम से विख्यात हो गया।
पंजुनराय कछवाहा महोबा, पडिहार राजकुमार खेता खंगार गढ़कुंडार की ख्याति सेर् ईष्यालु हुए, उन्होंने पृथ्वीराज चौहान के भाई, कान्हापाल चौहान को अपने पक्ष में कर खेता खंगार को मरवाने के यत्न ढूंढना चालू किये। बड़ी-बड़ी युक्तियां ढूंढी गईं। अंत में सोचा, महाराज पृथ्वीराज चौहान खेता खंगार को बड़ा शूरवीर कहकर प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि खेता खंगार ने सोरठ (सौराष्ट्र) में कुश्ती लड़कर शेर मारा है। भला यह कैसे हो सकता है। क्यों न शेर से लड़वाकर खेता खंगार को मरवा दिया जाय। कान्हापाल चौहान ने पंजुनराय को भरोसा दिया, मैं महाराज से स्वीकृति ले लूंगा। भिण्ड के वनों में आदमी और शेर के युध्द का नाटक खेला जाय। युक्ति ठीक है।
युक्ति के मुताबिक भिण्ड राज्यान्तर्गत बियाबान जंगल में एक दर्शक मंच बनाया गया। आसपास के सभी राजे, महाराजे, सामंत, सरदार आमंत्रित किये गये। महाराज पृथ्वीराज चौहान की आज्ञा से नरराज और वनराज के आकर्षित युध्द का ऐलान किया गया। निश्चित तिथि पर सब लोग उस बियाबान जंगल में एकत्रित हुए।
दिल्लीश्वर महाराज पृथ्वीराज चौहान ने गढ़कुंडार के अधिपति खेता खंगार को वनराज से कुश्ती लड़ने हेतु निर्वाचित किया। जंगल का हांका किया गया। बब्बर शेर के निकलते ही खेता खंगार को मुकाबला करने हेतु राजा ने आदेशित किया। जंगली मैदान के बीच एक निहत्था विशालकाय शरीर, हृष्ट-पुष्ट रोबीला पुरुष खेता खंगार विद्यमान था। उसी तरह हृष्ट-पुष्ट रोबिला बब्बर शेर निकलकर मैदान में आया। उसने अपने शिकार को सामने खड़ा देखकर गुर्राकर पूंछ को ऐंठ मारी और बड़ी हैकड़ी के साथ गढ़कुंडार अधिपति खेता खंगार पर आक्रमण कर दिया। उसने हमलावर बब्बर शेर के दोनों पैरों को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया। वनराज और नरराज दोनों आपस में गुत्थम गुत्था होने लगे। स्यारों ने समझ लिया था कि उनका कांटा बिन प्रयास निकल गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान भूतों की चालों से अनभिज्ञ थे। सन्नाटा छाया हुआ था। खेता खंगार पर बब्बर शेर हावी था। खेता ने अपनी पूर्ण शक्ति से वनराज को धकेला और उसे पटकर ऊपर सवार हो गया। फिर लात घूंसा मार-मारकर बब्बर शेर को पस्त कर डाला। आवेश में उसने बब्बर शेर के बाएं पैर पर, अपना दायां पैर रखा और उसका दायां पैर अपने हाथ में लेकर, उसे चीर डाला। बब्बर शेर के मरते ही, उपस्थित जन समूह चिल्ला उठा। शेर चिरा, शेर चिरा, मंच पर तालियां बज गईं। महाराज पृथ्वीराज चौहान खुशी से झूम उठे, रक्त रंजित खेता खंगार हर्षित मन महाराज पृथ्वीराज चौहान के चरणों में आकर झुक गया। शाबास और धन्यवाद के बीच खेता खंगार का जयघोष गूंज गया।
महाराज पृथ्वीराज चौहान ने इस अविस्मरणीय घटना पर उस जगह एक ग्राम बसाने का ऐलान किया और उसका नाम रखा ‘शेरचिरा’। राजा ने ऐसा कर जनवाणी को ऊपर कर दिया। राजा ने फिर चन्द कवि से पूछा- कविराज शेर का कोई अच्छा सा नाम बताओ।
चन्द बोले राजन-नाहर, केहर, सिंह, राज बोले बस हमने राजकुमार खेता खंगार को अब ‘खेतसिंह’ खंगार की संज्ञा दे दी है। क्यों चन्द ठीक है न, शेर को मारने वाला सिंह पुरूष तो कहलाएगा ही। महाराज की जय हो, जय हो की ध्वनि आकाश मंडल में गूंज गई। तभी बहादुर क्षत्रिय लोग अपने नाम के साथ ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग करने लगे हैं

Aabhar : Sanjay Singh Ji Gaur

History of Singh Word

Er Vikram Nath Chouhan

लेखक

Er Vikram Nath Chouhan

Vikram Chouhan is a Professional Blogger, Creative Website Designer & Developer, SEO Expert from Udaipur, Rajasthan. He is also Extremely Passionate Creative Entrepreneur. If you are looking for create your Professional Website, Mail at ervikramnathchouhan@gmail.com.

3 Comments

  1. Rathodpravinsinh

    Ta.Chuda dist. Surendranagar GMA.kudla

  2. Rajkaran singh

    uttar pardesh chitrkoot dham Karvi .ta. rajapur. Po. Biharwan. Naini

  3. shyaudan singh bhatee(khangarvanshi)

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